उत्तर प्रदेश

पूनम मिश्रा राष्ट्रीय कवयित्री

संबंधों की परिधि में अपने अस्तित्व को तलाशती बेटी*

एक लड़की का सपना देखना जितना सहज है, उन सपनों को अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाकर जी पाना उतना ही कठिन। उसके सपनों से पहले अक्सर उसकी मर्यादाएँ तय कर दी जाती हैं और उसकी उड़ान से पहले आकाश की सीमाएँ।

लड़की के लिए संघर्ष हमेशा बाहर की दुनिया से नहीं होता। कई बार सबसे कठिन युद्ध उन्हीं दीवारों के भीतर लड़ा जाता है, जहाँ उसे सबसे अधिक अपनापन मिलना चाहिए। उसके सपनों को ज़िद, उसकी स्वतंत्रता को स्वार्थ और उसकी असहमति को संस्कारों की कमी कह दिया जाता है।

वह चुप रहे तो उसकी चुप्पी को सहमति समझ लिया जाता है और बोल उठे तो उसके शब्द विद्रोह कहलाते हैं। वह समझौता करे तो संस्कारी है, अपने अस्तित्व के लिए खड़ी हो जाए तो जिद्दी। उसके लिए सफलता केवल एक उपलब्धि नहीं, बल्कि उन अदृश्य सीमाओं को पार करने का साहस है, जिन्हें समाज ने उसके चारों ओर खींच रखा है।

फिर भी उसका संघर्ष परिवार से नहीं, उस सोच से है जो प्रेम के नाम पर अधिकार और परंपरा के नाम पर बंधन को उचित ठहराती है। कोई भी घर तब सचमुच घर बनता है, जब वहाँ बेटी के सपनों को उसके संस्कारों के विरुद्ध नहीं, उसके अस्तित्व के विस्तार के रूप में देखा जाए।

क्योंकि किसी लड़की की उड़ान केवल उसकी अपनी नहीं होती। उसके पंखों से किसी दूसरी लड़की को भी आकाश दिखाई देने लगता है। उसकी एक जीत उन असंख्य बेटियों के भीतर जन्म लेती उम्मीद होती है, जिन्हें अब तक अपने सपनों से पहले दूसरों की इच्छाएँ पूरी करना सिखाया गया है।

और शायद इसीलिए लड़की की सफलता को केवल उसकी मंज़िल से नहीं, उस रास्ते में सहन किए गए मौन, असहमति और संघर्ष से भी समझना चाहिए। कुछ मंज़िलें केवल हासिल नहीं की जातीं—उनके लिए भीतर की पूरी दुनिया से लड़ना पड़ता है।

जीवन के आधार से लड़ना पड़ता है,
तथाकथित व्यवहार से लड़ना पड़ता है।
इक लड़की जब सपने पूरे करती है….
अपने ही परिवार से लड़ना पड़ता है।

©️ Poonam Mishra ✍🏻

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button